योगिराज शिव
योग का अभिलेखीय सूत्रपात पतंजलि योग से मिलता है । आगे चलकर योग के बहुत प्रकार हुये यथा:--भक्तियोग, प्रेमयोग, लययोग, नादयोग, ध्यानयोग, तंत्रयोग, क्रियायोग आदि आदि । हरेक योगों के द्वारा ईश्वर की प्राप्ति की गयी, मोक्ष पाये गए । उसके अलग- अलग संत,मुनि, ऋषि एवं गुरु होते रहे और अपने- अपने योग मार्ग की सर्वोच्चता स्थापित करते रहे । आज भी योग की कई विधाएँ हमारी जानकारियों में व्याप्त हैं । जिसे जिसमे मन लगता है वह उस विधा में जाने को स्वतंत्र है ।
इन सभी योगों का जब अध्ययन किया जाता है तो एक ही सार प्रकट होता है -- वGह है जीवात्मा को परमात्मा दे मिलाना अर्थात् जीव का व्रह्म हो जाना । जिस मूल आत्मा से जीवात्मा का आविर्भाव हुआ उस जीवात्मा को पुनः मूल सत्ता यानि मूल आत्मा ( परमात्मा ) में विलीन हो जाना । कहने का तात्पर्य है कि सभी योगों की यात्रा यानि प्रक्रियायों का अंतिम परिणाम है जीव का व्रह्म से एकमेक हो जाना । सभी योगों के मालिक उसके सदगुरु होते हैं जो खास योग की विधा से शिष्यों का मार्गदर्शन कर अंतिम परिणति तक पहुचाते हैं ।
हैम पीछे चर्चा कर आये हैं कि जगत् की उत्पत्ति, स्थिति एवं लय इन तीनो के मालिक स्वभाविकतः शिव हैं । इस सृष्टि की उत्पत्ति ही शिव की ईच्छा से हुई है । जब सृष्टि नहीँ थी समय ( काल ) नही था तब भी मात्र शिव थे । अर्थात् सृष्टी के पूर्व की महाशून्यता में भी शिव की उपस्थिति थी । शिव महाशून्य में भी थे तब ही तो अपनी मौज से ( ईच्छा ) से सृष्टि की की , जगत् की उत्पत्ति हुई, चराचर बना , सभी जीव-जंतु बने , रंग विरंगी दुनिया बनी, सुख-दुःख , छोटे- वड़े मानव, अमानव आदि आदि सृष्ट हुए और इस सृष्टि का क्रम पल- प्रतिपल चलता आ रहा है, चलता जा रहा है और चलता जाता रहेगा और इन सभी का आधार उनकी ईच्छा ( मौज ) है ।
जैसे ही परमात्मा से जीवात्मा सृष्ट होगी तो यही कहा जायेगा कि परमात्मा शिव थे जिनका विस्तार जीवात्मा है और संहारक शक्ति शिव के ही पास है । संहार का अर्थ है पूरी दुनिया ( सृष्टि ) का समाप्त हो जाना अर्थात् पुनः महाशून्य की स्थिति आ जानी ।जब ऐसा होगा तो संसाररूपी अनेकात्माओं का विस्तार पुनः सिमट कर एक शिव में एकाकार हो जायेगा । हम देखते हैं कि उत्पत्ति, स्थिति एवं लय ( संहार ) का क्रम हर पल चल रहा है । जीव उत्पन्न हो रहे हैं , चल रहे हैं फिर समाप्त हो रहे हैं । पूर्ण रूप से समाप्त होने के पूर्व यह क्रम पल-प्रतिपल चलता आ रहा है और न जाने कव तक चलता रहेगा । इस चलने के क्रम में ही जीवात्मा का परमात्मा से योग कराने की बात चलती है और सारे योगों का अस्तित्व देखने में आ रहा है । इस बीच के योगों की प्रक्रिया जिसे हम जीवात्मा का परमात्मा से एकमेक होने का विचार करते हैं वहां मूल रूप से शिव ही जीवात्मा हैं और पुनः शिव ही अपनी ईच्छा से अपने विस्तार ( जीवात्मा ) को समेट कर जीवात्मा से स्वयं परमात्मा शिव हो जाते हैं ।इन सभी योगों की प्रक्रियाएँ जो हो , लयकीन जो घटना घटित होती है वह है - जीवन- मरण से जीव की मुक्ति की, उसके मूल कारक शिव ही हैं इसलिए योग की सफलता के मूल कारण भी शिव ही हैं । वही शिव, योग की सारी विधाओं के जनक और परिणाम भी हैं ।
ऐसे भी हैम देखते हैं कि हर योग में एक सदगुरु होते हैं । देवताओं के जो गुरु माने गए हैं वृहस्पति , उनके गुरु हैं शिव । इसी प्रकार दानवों के गुरु माने गए हैं शुक्राचार्य, इनके भी गुरु शिव हैं । इसप्रकार सभी योग के सभी गुरु के दादा गुरु शिव ही हैं ।तंत्र या योग को किसी विधा के इतिहास पर शुक्ष्म ध्यान देने से स्पष्ट होता है कि सभी योग के सदगुरुओं के मूल गुरु , शिव हैं । ऊपर के वर्णन से हमें मानना होगा कि सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति एवं लय की शक्ति धारित करने के कारण जीवन मुक्ति के सभी प्रक्रियाओं के मूल में शिव को ही रहना पड़ेगा , दूसरे किसी की शक्ति में नही रह पायेगी ; रह भी नही सकती ~ बहरहाल कल्पना करना ही व्यर्थ होगा । हठ योग, तंत्र योग, अघोर योग आदि जितने भी प्रकार के तंत्र एवं योग हैं , सभी आधाररूपी शक्ति ( मोक्षदाता ) शिव को ही मानते हैं । जब सृष्टि एवं उसका कण-कण शिव की ईच्छा से सृष्ट होगा तब मनुष्य असुर, ज्ञान, अज्ञान सबों की उत्पत्ति के मूल कारण तो शिव ही होंगे फिर योग में जब ज्ञान की बात होगी, मुक्ति की बात होगी तो इसको भी सम्पन्न करना तो शिव को ही पड़ेगा ।ऋषियों ने अनेकों जगह इस तथ्य को स्पष्ट किया है कि सभी योगो के जनक और उसके परिणाम के कारक मात्र शिव ही हैं ।
पूर्व में हम विचार कर आये हैं कि सृष्टि की उत्पत्ति के शुभारम्भ में जो प्रथम पुरुष हुआ वे शिव थे जिन्हें आदि देव कहा गया।
इस प्रकार शिव को महायोगी क्या योगीराज कहना हमारी विवशता है । इसके अतिरिक्त जो कुछ भी हम विचार करेंगे वह गलत होगा ।
वस्तुतः शिव की ईच्छा विस्तार से सृष्ट सृष्टि के प्रारम्भ में एक ही सत्ता ( परमात्मा ) थी, इसलिए सृष्टि का प्रथम पुरुष अथवा आदि पुरुष शिव ही थे जो आगे चलकर आदि देव कहलाए । इस शिव में ईच्छा शक्ति इतनी शक्तिशाली थी कि सिर्फ ईच्छा की गयी और सृष्टि प्रोजेक्ट हो गया । जिसने मात्र अपनी ईच्छा से उतने बड़े एवं जटिल सृष्टि ( जगत् ) का निर्माण किया, इस जटिलता को दूर करने का ज्ञान भी उसी ईच्छा धारी को होगा । जब भी उस सृष्टि को अपने में समेटने की ईच्छा करेगा तो वह ईच्छा भी उसी को करना होगा । अर्थात् सृष्टि की उत्पत्ति एवं लय के ज्ञान का मालिक एक मात्र वही शक्ति ( शिव ) होंगे । एक छोटे से उदहारण से समझने का प्रयास किया जा सकता है । माना जाय कि टेलीविजन यंत्र का अविष्कार हुआ । एक पहला व्यक्ति होगा जिसे ईच्छा हुई होगी, ज्ञान हुआ होगा और क्रियाओं के द्वारा टेलीविजन का निर्माण किया होगा । एक प्रथम व्यक्ति तो होगा ही होगा और वही प्रथम व्यक्ति टेलीविजन के निर्माण, मरम्मत्ति, नष्ट करने एवं पुनर्निर्माण का ज्ञान धारित किया होगा ।बाद में उनसे ज्ञान पाकर जो भी निर्माता बन जाय परन्तु पहला वैज्ञानिक यानि आदि वैज्ञानिक तो एक होगा और उसे ही इस यंत्र की उत्पत्ति, स्थिति, लय एवं पुनर्निर्माण का ज्ञान होगा ।इसी प्रकार इस जगत् की सृष्टि निर्माण एवं लयकर्ता प्रथम सत्ता शिव हैं ।इसलिए जब भी उत्पत्ति, स्थिति एवं लय के क्रम में किसी जीवात्मा की वापसी मूल परमात्मा में करने की बात होगी तो उसी प्रक्रिया एवं उसके निष्पादन का प्रथम ज्ञान तो शिव के पास ही होगा । योग का अर्थ ही है परमात्मा से मिलन ( योग ) कराना । यह कार्य जब किसी प्रथम जीवात्मा के साथ किया गया होगा तो यह कार्य शिव को ही करना पड़ा होगा इसमें संदेह नहीं । इसप्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रथम योग और प्रथम योगगुरु आदिपुरुष , आदि देव , आदि गुरु शिव ही होंगे ।
सभ्यता के विकास के साथ अध्यात्म का भी विकास हुआ । विकास शब्द तो उपयुक्त नही है यहाँ पर, चूँकि विकास के क्रम से आगे चलता है , लेकिन अध्यात्म के साथ विकास शब्द का प्रयोग सही अर्थ में नही किया जा सकता परन्तु शब्दों का सहारा अभिव्यक्ति के लिए अनिवार्य हो जाता है और कभी-कभी किसी अभिव्यक्ति को सही रूप से अभिव्यक्त करने के लिए सही शब्द उपलव्ध नही हो पाते । फिर भी समझने के ख्याल से हैम विकास शब्द का प्रयोग करते हैं । मूल रूप से जीवात्मा का परमात्मा से मिलन का आधार प्रेम माना गया है चूँकि परमात्मा से निकली सत्ता आत्मा को परमात्मा से ही प्यार होगा । प्रकृति की स्थिति के क्रम में जीवात्मा कर्म करने की स्वतंत्रता को प्राप्त कर मूल सत्ता को भूल जाती है और यही से योग की ( आत्मा से परमात्मा का मिलन में ) कठिनाई प्रारम्भ हो जाती है ।
जीवात्मा का कर्ता भाव परमात्मा से मिलन में बाधक हो जाता है । यही जीवात्मा जब बार - बार जन्म लेने के वाद थकती है तो परमात्मा शिव की ईच्छा (दया ) से अपने मूल स्वरुप को ढूंढती है । ढूंढने की प्रक्रिया योग की प्रक्रिया हो जाती है। प्रक्रिया के कारण ही योग के प्रकार बन जाते हैं । प्रकार अलग-अलग होने के कारण उसके सदगुरु भी अलग-अलग हो जाते हैं अर्थात् सभी प्रकारों के जन्मदाता शिव ही विभिन्न प्रकार के योग के नियामक होने के कारण शरीर में आकर विभिन्न सदगुरुओं के रूप में अवतरित होते हैं ।
सभी प्रकारों के योगों का शुक्ष्म अध्ययन करने से यह स्पष्ट होगा कि योग की प्रक्रियाएँ जीव को शिव नही बनती वल्कि प्रक्रियाएँ ये समझाती है कि जीव का कर्ता भाव मिथ्या है । प्रक्रियाएँ जीवात्मा को थका देती है, हरा देती है और जीवात्मा यह समझने की स्थिति में आती है कि वह मूल कर्ता नहीँ वल्कि मूल कर्ता तो परमात्मा शिव हैं । वो तो एक उपकरण मात्र है जिसका संचालन कर्ता परमात्मा शिव स्वयं हैं । बिना उनकी ईच्छा(दया) के मोक्ष (वापसी ) नही हो सकती । इस तथ्य को स्पष्ट करने के लिए हैम एक दो योग की प्रकिया पर विचार करते हैं ।
कुण्डलनी योग का मूल सिद्धान्त है कि मनुष्य के शरीर में सात चक्र होते हैं --मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, आहत, अनाहत, आज्ञाचक्र एवं सहस्त्रार । कहा जाता है कि व्यक्ति के शरीर के निचले भाग ( गुदा मार्ग और शिष्न के मध्य ) में शिव की वह शक्ति यानि जीवात्मा, सुसुप्तावस्था में रहती है । यह कुण्डलनी शक्ति जब तक अपने मूल सत्ता ( सहस्त्रार में स्थित शिव ) को भूली रहती है तब तक वह जीव भाव में रहती है । हठ योग की प्रक्रिया में इस मूलाधार में स्थित सुसुप्त कुण्डलनी को जगाया जाता है ।जब यह शक्ति जगती है तो यह क्रम से सभी चक्रों को पार करती हुई सहस्त्रार में स्थित शिव से मिलती है और एकाकार हो जाती है । हैम इसकी प्रक्रियाओं की गहनता में नही जाना चाहते लेकिन यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि जब कुण्डलनी शक्ति जगती है तो उसे उर्धमुखी करने में सदगुरु की दया की जरुरत होती है । यदि सद्गुरु नही रहे तो यह जगी शक्ति साधक के लिए खतरनाक हो जाती है। हर चक्रों के जगने और उसे ऊपर की ओर अग्रसर करने में गुरु की परम आवश्यक्ता होती है ।इसीलिए हठ योग को तलवार पर चलने जैसा बताया गया है।
इस प्रकार राजयोग, ध्यान योगादि में सीधे आज्ञाचक्र को जगाने की प्रक्रिया की जाती है । इस क्षेत्र में यह मन जाता है कि मूलाधार से चलने की प्रक्रिया सर्वसुलभ नही है, सभी जनों के लिए साध्य नही है इसलिये इस योग में ध्यान की प्रक्रियाओं से आज्ञाचक्र को जगा कर सहस्त्रार तक पंहुचा जाता है। यहाँ भी आज्ञाचक्र के जगने के वाद शक्ति को उर्धगामी बनाने के लिए सदगुरु की दया की आवश्यकता होती होती है अन्यथा यहाँ से भी साधक् को नीचे गिरने का खतरा बना रहता है । इसीप्रकार हर योग की अपनी प्रक्रिया है परन्तु सभी का लक्ष्य और मंजिल एक ही है जीवात्मा को जीव भाव से मुक्त कर परमात्मा से योग करा देना । इन योगों में सदगुरु की दया (ईच्छा) ही सर्वोपरि होती है । ये सदगुरु शिव के ही प्रतिनिधि (शिव) होते हैं ।
इन प्रक्रियाओं के मूल में जाने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि जीवात्मा, जीवात्मा तभी तक रहता है जव तक वह जीव भाव में हो, कर्ता भाव में हो । मनुष्य को भी ईच्छा करने की स्वतंत्रता है , ज्ञान प्राप्त कर क्रिया करने को भी स्वतंत्र है इसी कारण से जीव का कर्ता भाव उसे जीवात्मा बनाये रखती है ।मनुष्य को यदि बता दिया जाय कि इस प्रक्रिया को करने से ईश्वर की प्राप्ति होगी तो उसे प्रतीत होता है कि वह प्रक्रिया कर ईश्वर को प्राप्त कर लेगा, लेकिन जब प्रक्रियाओं में ईमानदारी पूर्वक जाता है और उम्र बीतते जाता है ,क्षमता घटते जाती है तब अंतिम में वह समझने लगता है कि जितना करना था कर लिया अब वह कुछ न कर सकेगा, वैसी स्थिति में वह अपने गुरु पर समर्पित हो जाता है यानि उसका कर्ता भाव समाप्त हो जाता है । अंत में गुरु/सदगुरु दया करते हैं जिससे जीव शिव हो जाता है ।
इन सारे उदाहरणों से यह स्पष्ट हो जाता है कि सभी योगों के सदगुरु या मालिक या मूल कर्ता शिव ही हैं । इसीलिए शिव को योगों का राजा अर्थात् योगिराज कहा गया है जो शास्वत सत्य है ।
हेमचन्द्र प्रसाद (शिव-शिष्य)