Friday, August 11, 2017

योगिराज शिव


                                                                                                             
                         योगिराज शिव  
      योग का अभिलेखीय सूत्रपात पतंजलि योग से मिलता है । आगे चलकर योग के बहुत प्रकार हुये यथा:--भक्तियोग, प्रेमयोग, लययोग, नादयोग, ध्यानयोग, तंत्रयोग, क्रियायोग आदि आदि । हरेक योगों के द्वारा ईश्वर की प्राप्ति की गयी, मोक्ष पाये गए । उसके अलग- अलग संत,मुनि, ऋषि एवं गुरु होते रहे और अपने- अपने योग मार्ग की सर्वोच्चता स्थापित करते रहे । आज भी योग की कई विधाएँ हमारी जानकारियों में व्याप्त हैं । जिसे जिसमे मन लगता है वह उस विधा में जाने को स्वतंत्र है ।
                इन सभी योगों का जब अध्ययन किया जाता है तो एक ही सार प्रकट होता है -- वGह है जीवात्मा को परमात्मा दे मिलाना अर्थात् जीव का व्रह्म हो जाना । जिस मूल आत्मा से जीवात्मा का आविर्भाव हुआ उस जीवात्मा को पुनः मूल सत्ता यानि मूल आत्मा ( परमात्मा ) में विलीन हो जाना । कहने का तात्पर्य है कि सभी योगों की यात्रा यानि प्रक्रियायों का अंतिम परिणाम है जीव का व्रह्म से एकमेक हो जाना । सभी योगों के मालिक उसके सदगुरु होते हैं जो खास योग की विधा से शिष्यों का मार्गदर्शन कर अंतिम परिणति तक पहुचाते हैं ।
       हैम पीछे चर्चा कर आये हैं  कि जगत् की उत्पत्ति, स्थिति एवं लय इन तीनो के मालिक स्वभाविकतः शिव हैं । इस सृष्टि की उत्पत्ति ही शिव की ईच्छा से हुई है । जब सृष्टि नहीँ थी समय ( काल ) नही था तब भी मात्र शिव थे । अर्थात् सृष्टी के पूर्व की महाशून्यता में भी शिव की उपस्थिति थी । शिव महाशून्य में भी थे तब ही तो अपनी मौज से ( ईच्छा ) से सृष्टि की की , जगत् की उत्पत्ति हुई, चराचर बना , सभी जीव-जंतु बने , रंग विरंगी दुनिया बनी, सुख-दुःख , छोटे- वड़े मानव, अमानव आदि आदि सृष्ट हुए और इस सृष्टि का क्रम पल- प्रतिपल चलता आ रहा है, चलता जा रहा है और चलता जाता रहेगा और इन सभी का आधार उनकी ईच्छा ( मौज ) है ।
              जैसे ही परमात्मा से जीवात्मा सृष्ट होगी तो यही कहा जायेगा कि परमात्मा शिव थे जिनका विस्तार जीवात्मा है और संहारक शक्ति शिव के ही पास है । संहार का अर्थ है पूरी दुनिया ( सृष्टि ) का समाप्त हो जाना अर्थात् पुनः महाशून्य की स्थिति आ जानी ।जब ऐसा होगा तो संसाररूपी अनेकात्माओं का विस्तार पुनः सिमट कर एक शिव में एकाकार हो जायेगा । हम देखते हैं कि उत्पत्ति, स्थिति एवं लय ( संहार ) का क्रम हर पल चल रहा है । जीव उत्पन्न हो रहे हैं , चल रहे हैं फिर समाप्त हो रहे हैं । पूर्ण रूप से समाप्त होने के पूर्व यह क्रम पल-प्रतिपल चलता आ रहा है और न जाने कव तक चलता रहेगा । इस चलने के क्रम में ही जीवात्मा का परमात्मा से योग कराने की बात चलती है और सारे योगों का अस्तित्व देखने में आ रहा है । इस बीच के योगों की प्रक्रिया जिसे हम जीवात्मा का परमात्मा से एकमेक होने का विचार करते हैं वहां मूल रूप से शिव ही जीवात्मा हैं और पुनः शिव ही अपनी ईच्छा से अपने विस्तार ( जीवात्मा ) को समेट कर जीवात्मा से स्वयं परमात्मा शिव हो जाते हैं ।इन सभी योगों की प्रक्रियाएँ जो हो , लयकीन जो घटना घटित होती है वह है - जीवन- मरण से जीव की मुक्ति की, उसके मूल कारक शिव ही हैं इसलिए योग की सफलता के मूल कारण भी शिव ही हैं । वही शिव, योग की सारी विधाओं के जनक और परिणाम भी हैं ।
       ऐसे भी हैम देखते हैं कि हर योग में एक सदगुरु होते हैं । देवताओं के जो गुरु माने गए हैं वृहस्पति , उनके गुरु हैं शिव । इसी प्रकार दानवों के गुरु माने गए हैं शुक्राचार्य, इनके भी गुरु शिव हैं । इसप्रकार सभी योग के सभी गुरु के दादा गुरु शिव ही हैं ।तंत्र या योग को किसी विधा के इतिहास पर शुक्ष्म ध्यान देने से स्पष्ट होता है कि सभी योग के सदगुरुओं के मूल गुरु , शिव हैं । ऊपर के वर्णन से हमें मानना होगा कि सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति एवं लय की शक्ति धारित करने के कारण जीवन मुक्ति के सभी प्रक्रियाओं के मूल में शिव को ही रहना पड़ेगा , दूसरे किसी की शक्ति में नही रह पायेगी ; रह भी नही सकती ~ बहरहाल कल्पना करना ही व्यर्थ होगा । हठ योग, तंत्र योग, अघोर योग आदि जितने भी प्रकार के तंत्र एवं योग हैं , सभी आधाररूपी शक्ति ( मोक्षदाता ) शिव को ही मानते हैं । जब सृष्टि एवं उसका कण-कण शिव की ईच्छा से सृष्ट होगा तब मनुष्य असुर, ज्ञान, अज्ञान सबों की उत्पत्ति के मूल कारण तो शिव ही होंगे फिर योग में जब ज्ञान की बात होगी, मुक्ति की बात होगी तो इसको भी सम्पन्न करना तो शिव को ही पड़ेगा ।ऋषियों ने अनेकों जगह इस तथ्य को स्पष्ट किया है कि सभी योगो के जनक और उसके परिणाम के कारक मात्र शिव ही हैं ।
        पूर्व में हम विचार कर आये हैं कि सृष्टि की उत्पत्ति के शुभारम्भ में जो प्रथम पुरुष हुआ वे शिव थे जिन्हें आदि देव कहा गया।
            इस प्रकार शिव को महायोगी क्या योगीराज कहना हमारी विवशता है । इसके अतिरिक्त जो कुछ भी हम विचार करेंगे वह गलत होगा ।
            वस्तुतः शिव की ईच्छा विस्तार से सृष्ट सृष्टि के प्रारम्भ में एक ही सत्ता ( परमात्मा ) थी, इसलिए सृष्टि का प्रथम पुरुष अथवा आदि पुरुष शिव ही थे जो आगे चलकर आदि देव कहलाए । इस शिव में ईच्छा शक्ति इतनी शक्तिशाली थी कि सिर्फ ईच्छा की गयी और सृष्टि प्रोजेक्ट हो गया । जिसने मात्र अपनी ईच्छा से उतने बड़े एवं जटिल सृष्टि ( जगत् ) का निर्माण किया, इस जटिलता को दूर करने का ज्ञान भी उसी ईच्छा धारी को होगा । जब भी उस सृष्टि को अपने में समेटने की ईच्छा करेगा तो वह ईच्छा भी उसी को करना होगा । अर्थात् सृष्टि की उत्पत्ति एवं लय के ज्ञान का मालिक एक मात्र वही शक्ति ( शिव ) होंगे । एक छोटे से उदहारण से समझने का प्रयास किया जा सकता है । माना जाय कि टेलीविजन यंत्र का अविष्कार हुआ । एक पहला व्यक्ति होगा जिसे ईच्छा हुई होगी, ज्ञान हुआ होगा और क्रियाओं के द्वारा टेलीविजन का निर्माण किया होगा । एक प्रथम व्यक्ति तो होगा ही होगा और वही प्रथम व्यक्ति टेलीविजन के निर्माण, मरम्मत्ति, नष्ट करने एवं पुनर्निर्माण का ज्ञान धारित किया होगा ।बाद में उनसे ज्ञान पाकर जो भी निर्माता बन जाय परन्तु पहला वैज्ञानिक यानि आदि वैज्ञानिक तो एक होगा और उसे ही इस यंत्र की उत्पत्ति, स्थिति, लय एवं पुनर्निर्माण का ज्ञान होगा ।इसी प्रकार इस जगत् की सृष्टि निर्माण एवं लयकर्ता प्रथम सत्ता शिव हैं ।इसलिए जब भी उत्पत्ति, स्थिति एवं लय के क्रम में किसी जीवात्मा की वापसी मूल परमात्मा में करने की बात होगी तो उसी प्रक्रिया एवं उसके निष्पादन का प्रथम ज्ञान तो शिव के पास ही होगा । योग का अर्थ ही है परमात्मा से मिलन ( योग ) कराना । यह कार्य जब किसी प्रथम जीवात्मा के साथ किया गया होगा तो यह कार्य शिव को ही करना पड़ा होगा इसमें संदेह नहीं । इसप्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रथम योग और प्रथम योगगुरु आदिपुरुष , आदि देव , आदि गुरु शिव ही होंगे ।
                सभ्यता के विकास के साथ अध्यात्म का भी विकास हुआ । विकास शब्द तो उपयुक्त नही है यहाँ पर, चूँकि विकास के क्रम से आगे चलता है , लेकिन अध्यात्म के साथ विकास शब्द का प्रयोग सही अर्थ में नही किया जा सकता परन्तु शब्दों का सहारा अभिव्यक्ति के लिए अनिवार्य हो जाता है और कभी-कभी किसी अभिव्यक्ति को सही रूप से अभिव्यक्त करने के लिए सही शब्द उपलव्ध नही हो पाते । फिर भी समझने के ख्याल से हैम विकास शब्द का प्रयोग करते हैं । मूल रूप से जीवात्मा का परमात्मा से मिलन का आधार प्रेम माना गया है चूँकि परमात्मा से निकली सत्ता आत्मा को परमात्मा से ही प्यार होगा । प्रकृति की स्थिति के क्रम में जीवात्मा कर्म करने की स्वतंत्रता को प्राप्त कर मूल सत्ता को भूल जाती है और यही से योग की ( आत्मा से परमात्मा का मिलन में )  कठिनाई प्रारम्भ हो जाती है ।
          जीवात्मा का कर्ता भाव परमात्मा से मिलन में बाधक हो जाता है । यही जीवात्मा जब बार - बार  जन्म लेने के वाद थकती है तो परमात्मा शिव की ईच्छा (दया ) से अपने मूल स्वरुप को ढूंढती है । ढूंढने की प्रक्रिया योग की प्रक्रिया हो जाती है।  प्रक्रिया के कारण ही योग के प्रकार बन जाते हैं । प्रकार अलग-अलग होने के कारण उसके सदगुरु भी अलग-अलग हो जाते हैं अर्थात् सभी प्रकारों के जन्मदाता शिव ही विभिन्न प्रकार के योग के नियामक होने के कारण शरीर में आकर विभिन्न सदगुरुओं के रूप में अवतरित होते हैं ।
        सभी प्रकारों के योगों का शुक्ष्म अध्ययन करने से यह स्पष्ट होगा कि योग की प्रक्रियाएँ जीव को शिव नही बनती वल्कि प्रक्रियाएँ ये  समझाती है कि जीव का कर्ता भाव मिथ्या है । प्रक्रियाएँ जीवात्मा को थका देती है, हरा देती है और जीवात्मा यह समझने की स्थिति में आती है कि वह मूल कर्ता नहीँ वल्कि मूल कर्ता तो परमात्मा शिव हैं । वो तो एक उपकरण मात्र है जिसका संचालन कर्ता परमात्मा शिव स्वयं हैं । बिना उनकी ईच्छा(दया) के मोक्ष (वापसी ) नही हो सकती । इस तथ्य को स्पष्ट करने के लिए हैम एक दो योग की प्रकिया पर विचार करते हैं ।
              कुण्डलनी योग का मूल सिद्धान्त है कि मनुष्य के शरीर में सात चक्र होते हैं --मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, आहत, अनाहत, आज्ञाचक्र एवं सहस्त्रार । कहा जाता है कि व्यक्ति के शरीर के निचले भाग ( गुदा मार्ग और शिष्न के मध्य ) में शिव की वह शक्ति यानि जीवात्मा, सुसुप्तावस्था में रहती है । यह कुण्डलनी शक्ति जब तक अपने मूल सत्ता ( सहस्त्रार में स्थित शिव ) को भूली रहती है तब तक वह जीव भाव में रहती है । हठ योग की प्रक्रिया में इस मूलाधार में स्थित सुसुप्त कुण्डलनी को जगाया जाता है ।जब यह शक्ति जगती है तो यह क्रम से सभी चक्रों को पार करती हुई सहस्त्रार में स्थित शिव से मिलती है और एकाकार हो जाती है । हैम इसकी प्रक्रियाओं की गहनता में नही जाना चाहते लेकिन यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि जब कुण्डलनी शक्ति जगती है तो उसे उर्धमुखी करने में सदगुरु की दया की जरुरत होती है । यदि सद्गुरु नही रहे तो यह जगी शक्ति साधक के लिए खतरनाक हो जाती है। हर चक्रों के जगने और उसे ऊपर की ओर अग्रसर करने में गुरु की परम आवश्यक्ता होती है ।इसीलिए हठ योग को तलवार पर चलने जैसा बताया गया है।
             इस प्रकार राजयोग, ध्यान योगादि में सीधे आज्ञाचक्र को जगाने की प्रक्रिया की जाती है । इस क्षेत्र में यह मन जाता है कि मूलाधार से चलने की प्रक्रिया सर्वसुलभ नही है, सभी जनों के लिए साध्य नही है इसलिये इस योग में ध्यान की प्रक्रियाओं से आज्ञाचक्र को जगा कर सहस्त्रार तक पंहुचा जाता है। यहाँ भी आज्ञाचक्र के जगने के वाद शक्ति को उर्धगामी बनाने के लिए सदगुरु की दया की आवश्यकता होती होती है अन्यथा यहाँ से भी साधक् को नीचे गिरने का खतरा बना रहता है । इसीप्रकार हर योग की अपनी प्रक्रिया है परन्तु सभी का लक्ष्य और मंजिल एक ही है जीवात्मा को जीव भाव से मुक्त कर परमात्मा से योग करा देना । इन योगों में सदगुरु की दया (ईच्छा) ही सर्वोपरि होती है । ये सदगुरु शिव के ही प्रतिनिधि (शिव) होते हैं ।
               इन प्रक्रियाओं के मूल में जाने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि जीवात्मा, जीवात्मा तभी तक रहता है जव तक वह जीव भाव में हो, कर्ता भाव में हो । मनुष्य को भी ईच्छा करने की स्वतंत्रता है , ज्ञान प्राप्त कर क्रिया करने को भी स्वतंत्र है इसी कारण से जीव का कर्ता भाव उसे जीवात्मा बनाये रखती है ।मनुष्य को यदि बता दिया जाय कि इस प्रक्रिया को करने से ईश्वर की प्राप्ति होगी तो उसे प्रतीत होता है कि वह प्रक्रिया कर ईश्वर को प्राप्त कर लेगा, लेकिन जब प्रक्रियाओं में ईमानदारी पूर्वक जाता है और उम्र बीतते जाता है ,क्षमता घटते जाती है तब अंतिम में वह समझने लगता है कि जितना करना था कर लिया अब वह कुछ न कर सकेगा, वैसी स्थिति में वह अपने गुरु पर समर्पित हो जाता है यानि उसका कर्ता भाव समाप्त हो जाता है । अंत में गुरु/सदगुरु दया करते हैं जिससे जीव शिव हो जाता है ।
               इन सारे उदाहरणों से यह स्पष्ट हो जाता है कि सभी योगों के सदगुरु या मालिक या मूल कर्ता शिव ही हैं । इसीलिए शिव को योगों का राजा अर्थात् योगिराज कहा गया है जो शास्वत सत्य है ।
                     हेमचन्द्र प्रसाद (शिव-शिष्य)

Thursday, August 10, 2017

मन्त्रों का रहष्य

शिव का मन्त्र पंचाक्षरी कहा गया है यानि ' नमः शिवाय ' परन्तु कुछ लोग ॐ नमः शिवाय का जप करते हैं जो गलत है ।नमः शिवाय मन्त्र को जब लिखा जाता है तो सम्मान देने के लिए ॐ लगाया जाता है जैसे जब हम किसी का नाम लिखते हैं तो श्री लगाते हैं लेकिन पुकारते हैं तो श्री कहकर नहीँ पुकारते । जप तो पुकार है । इसी तरह भगवती के नवारण मन्त्र भी "ऐं ह्री क्लिंग चामुंडाये विच्चे " है लेकिन जब लिखते हैं तो ॐ लगा देते हैं । जप में ॐ छोड़ देना है।
         कुछ मन्त्र होते हैं जिसमे ॐ उस मन्त्र का part होता है जैसे ॐ नमो नमः शिवाय, ॐ नमो भगवते वासुदेवाय । यह ठीक उसी प्रकार है जैसे किसी का नाम है श्रीराम । जब नाम लिखना होगा तो लिखेंगे श्री श्रीराम और पुकारना होगा तो श्रीराम ही पुकारेंगे । ॐ अपने आप में एक स्वतंत्र और पवित्र मन्त्र है जिसका जाप स्वतंत्र रूप से होता है जो हठ योग की श्रेणी में आता है। इसको ध्यान में रखना आवश्यक है ।

साम्यवादी शिव

        पूर्व में हमने विचार करने की कोशिस की कि शिव ही पुरे व्रह्माण्ड ( सृष्टि ) की उत्पत्ति एवं लय के कारक हैं और मनुष्य की परिकल्पनाओं की सभी देवी - देवताओं में सर्वोच्य स्थान प्राप्त होकर महादेव (देवाधिदेव ) के रूप में स्थापित हैं । वे ही व्रह्म, महाकाल एवं सदाशिव हैं । जब प्रथम बार किसी ऋषि ने इनकी सत्ता एवं सामर्थ्य का अनुभव किया होगा तो वे पाये होंगे कि शिव मूल रूप से एक परम चैतन्य ऊर्जा है और शुक्ष्मतिशुक्ष्म है जिसका सिर्फ अनुभव किया जा सकता है ।सामान्यतया किसी चीज की उत्पत्ति के लिए प्रथम ईच्छा की जाती है , उसका ज्ञान प्राप्त किया जाता है एवं तदनुरूप क्रिया की जाती है तब जाकर कोइ वस्तु निर्मित होती है । मनुष्य भी साधारण रूप से भौतिक सुख सुविधाओं की वस्तुएँ सृष्ट की एवं वैज्ञानिक के रूप में उसी तीन क्रियाओं (ईच्छा, ज्ञान, क्रिया ) के द्वारा बड़े-बड़े आविष्कार किए । परन्तु शिव ने जो जगत् सृष्ट किया तो उन्होंने सिर्फ ईच्छा की, सोचा और उसी से जगत् प्रोजेक्ट हो गया । इतने शूक्ष्म और परम चैतन्य ऊर्जा को समझने के लिए ऋषियों ने शिव को भौतिक रूप देने का प्रयास किया ।  इसमें वे सफल नहीं हुए और अन्त मर थक हार कर मिट्टी का एक गोला बनाकर कह दिया कि यही शिव हैं । यही एक परिकल्पना शिवलिंग के रूप में युगों-युगों से चला आ रहा है जिसका शब्दार्थ ही होता है शिव का प्रतीक यानि जो उस परमात्म शक्ति का चिन्ह होगा जिससे वे जाने जायेंगे , पहचाने जाएँगे ।
      अब जब शिवलिंग का प्रादुर्भाव हुआ तो उसकी पूजा अथवा उसके प्रति लगाव का क्या माध्यम होगा जिससे सर्वसाधारण उसकी सत्ता को मूर्त रूप में देख सके और अपनी श्रद्धा उसे दे सके । ऋषियों ने सोचा कि शिव तो सभी के हैं , यदि कोई खास प्रक्रिया बनायी जायेगी तो साधारण पुरुष हो सकता है कि नहीं कर पाए । ऐसी स्थिति में उनके प्रति प्रेम प्रदर्शित करने के लिए बताया गया कि सिर्फ जल चढ़ाया जाय चुकीं जल हर कोइ चढ़ा सकता है । फिर वेलपत्र, धतूर, भाँग आदि चढाने की बात कही गयी जो जंगलों में यूँ ही आसानी से उपलब्ध हो सकते हैं । इसे पैदा करने की जरुरत नहीं होगी । इस प्रकार शिवलिंग एवं इसकी पूजा का प्रारम्भ हुआ । स्थायी रूप से जल अर्पित हो सके इस हेतु पत्थरों को वह स्वरुप दिया गया और मंदिर आदि बनाये गए । रहस्य तो यह है कि उस परम ऊर्जा का न तो कोई रूप दिया जा सकता न ही उसे किसी घर ( मंदिरों ) में स्थापित किया जा सकता है । वह तो सृष्टि के कण-कण, अणु, परमाणु में है । परन्तु यह रहस्य सभी लोग तो समझ नहीं सकते तो परिणाम में ऋषियों ने शिवलिंग की परिकल्पना दी । यह शिवलिंग विभिन्न कहानियों के साथ विभिन्न स्थानों मर भिन्न- भिन्न रूपों में अवस्थित हैं । उन्हें घर-घर का बाबा कहा गया । भोला बाबा कहा गया और वताया गया कि वे शीघ्र प्रशन्न होते हैं और सबों का कल्याण करते हैं ।
         शिवलिंग की परिकल्पना के बाद और आगे का विचार साधुओं ने किया । उन्हें और आसानी से समझने के लिए आगे चलकर उनका मानवीकरण करने का का सोचा गया । उस शिव का मानवीकरण किया गया और उनकी शक्तियों को, उनकी सहजता को प्रदर्शित करने के लिए मानव का स्वरुप दिया गया जो आज के जनमानस में ब्याप्त है। उनके अनेक चित्रों में एक सामान्य चित्र जिसमे उन्हें अपनी पत्नी के साथ और पूरे परिवार के साथ दिखाया गया है । शिव परिवार में शक्ति ( पत्नी ), पुत्रों ( गणेश , कार्तिकेय ) को दिखाया गया है । इन सबों के अपने अपने वाहन भी दिखाए गए हैं । शिव के आभूषण भी दिखाए गए हैं । सबों पर थोड़ा ध्यान से विचार करने पर यह परिलक्षित होगा कि शिव का परिवार विषमता में समता की पराकाष्ठा है । एक - एक पर हम संक्षेप में विचार करने का प्रयास करेंगे ।
         शिव के गले में , बांहों , कलाइयों में आभूषण के रूप में विषधर सर्प दिखाए गए हैं । सर्प विष धारित करने के कारण लोगों द्वारा मारे जाते हैं । सर्प को घर में देखते ही लोग उसे लाठियाँ मारते हैं । सर्प को कोई प्यार नही करता । कहा जाय कि विषधारी होने के कारण मनुष्यों द्वारा उपेक्षित किया जाता है । अर्थ यह है कि जिस व्यक्ति का कोइ सहारा नही है, जो सबों से उपेक्षित हैं, जहरीले हैं वे कहाँ जायेंगे ? उन्हें कौन शरण देगा ? उससे कौन प्यार करेगा ? बात आती है शिव की । अच्छे एवं बुरे जो भी हैं वे सभी शिव के द्वारा ही तो सृष्ट हैं । वे सभी शिव के ही तो हैं । शिव ने कहा कि चलो जिसे कोई प्यार नहीं करेगा उसे मैं गले लगाऊंगा और सर्प को उन्होंने अपना आभूषण बना लिया । गंगा सबसे पवित्रतम जल है, सर्वपूजित है । शिव ने उसे मस्तक की जटाओं पर रख लिया । दूज का चाँद कुछ समय के लिए आसमान में रहता है उसे कलंकित माना गया है । शिव ने उसे अपने भाल पर रख लिया ।
       शिव की शक्ति को उनकी पत्नी (स्त्री ) के रूप में दिखाया गया । शिव जाने ही जाते हैं अपनी शक्तियों से । कहा गया है कि शक्ति के विना शिव कुछ भी नही हैं । शक्ति ही उनका अस्तित्व है । शक्ति शब्द स्त्रीलिंग है इसलिए स्त्री ( पत्नी ) के रुप में शिव परिवार में रखा गया । उस शक्ति का नाम पार्वती रखा गया । पार्वती का वाहन शेर बनाया गया । शिव का वाहन बैल । पुत्र कार्तिकेय का वाहन मोर तो गणेश का वाहन मूषक (चूहा ) बनाया गया । शिव का आसन व्याघ्र चर्म बनाया गया । ये सभी सदस्य मजे से एक साथ एक परिवार बनकर हैं । इन सबों के बीच परस्पर विपरीत स्वभाव बाले सदस्य हैं । जैसे शिव की सवारी बैल (बसहा ) का शत्रु पार्वती की सवारी व्याघ्र का भोजन है । शेर बैल को मार कर खाता है । कार्तिकेय का वाहन मोर है जो साँप का शत्रु है । मोर सर्प को मार कर खा जाता है । सर्प मोर का भोजन है । गणेश का वाहन चूहा है जिसका शत्रु सर्प है । चूहा सर्प का प्रिय भोजन है । सर्प चूहा को मार कर खा जाता है। इस प्रकार ये सभी जन्मजात स्वभाव से ही एक दूसरे का शत्रु हैं परन्तु सभी शिव के परिवार में प्रेम से एक साथ  रहते हैं । यह स्थिति स्वाभाविक नही है । विद्वान् ऋषियों ने यह बताने की चेस्टा की है कि सृष्टि के सभी प्रकार के जीव ( अच्छे- बुरे ) उन्हीं के के हैं । उनकी नजर में सभी प्रिय हैं । साम्यवाद कहता है कि विश्व के हर व्यक्ति को जीने के लिये एवं प्रकृति प्रदत्त सुविधाओं को भोगने के लिये सामान अधिकार है । कोई गरीब एवं कोई अमीर नही होगा । कोई किसी का शत्रु नहीं होगा । शिव के उस स्वरुप से साम्यवाद का उत्कृष्ट उदाहरण मिलता है । शिव के ही सभी हैं और सभी के शिव हैं । मित्र, शत्रु, ऊँच- नीच, गरीब-अमीर, साधू-असाधु आदि- आदि जितने प्रकार की भिन्नताएं सृष्टि में हैं सभी शिव के समक्ष समान हो जाते हैं । शिव कभी भी शत्रुओं को मार डालने का सिद्धान्त नही देते । वे तो सबों को समान प्यार देते हैं । यह भी कहा जा सकता है कि शिव के सान्निध्य में परस्पर विरोधी स्वभाव वाले भी अपना स्वभाव छोड़ शिव भाव में साम्यवादी हो जाते हैं ।
      आध्यात्मिक कहानियों में कई देवी देवताओं के बारे में पढ़ा जाता है । उसमें कहा गया है कि वे देवता, साधुओं की रक्षा करेंगे और असुरों का नाश करेंगे । शिव ने कहा सुर हों या असुर, सभी मेरे हैं और मुझको समान रूप से प्रिय हैं । यही कारण है कि वे ( शिव ) सुरासुर पूजित हैं   देवता और दानव सभी उनके प्रिय हैब और सभी उनके पास निर्भीक होकर जाते हैं । कहा तो यह जाय कि शिव इतने उदार और साम्यवादी हैं कि देवता की अपेक्षा असुरों को ज्यादा प्यार करते हैं । बुरे स्वभाव बालों को अपने पास आने में प्राथमिकता देते हैं । कथा है कि एक बार शिव के साथ देवता और दानव दोनों जा रहे थे । देवताओं को अपने देवत्व का अहंकार होता है इसलिए यात्रा में शिव के पीछे पहले देवता चल रहे थे और देवता के पीछे यानी अंतिम पंक्ति में असुर चाक रहे थे । असुरों की प्रवृति होती है दूसरों को तकलीफ देना । इस यात्रा में तो असुर भी अपने प्रेम के अहंकार में थे , वे चाहते थे शिव के ठीक पीछे चलें और देवता उनके पीछे चलें । इस सोच के परिणामस्वरूप असुर अपने आगे चल रहे देवताओं के पैर में ठोकर लगा कर उनकी चाल में वाधा डालते थे । कहा जाय कि वे देवताओं को गिरा दिया करते थे ताकि वे पीछे गो जायँ । देवताओं को असुरों की यह क्रिया अच्छी नही लगी परन्तु परेशान थे ।अन्त में उन्होंने असुरों की शिकायत शिव से कर दी । कहानी है कि शिव ने देवताओं को कहा कि ऐसी वात है तो आप लोग सबसे पीछे चले जायँ और असुरों को अपने से आगे चलने दें । देवताओं को आदेश मानना पड़ा । अर्थात् शिव उपेक्षितों को प्राथमिकता देते हैं । इन आधारों पर यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नही होगी कि शिव सबसे बड़े साम्यवादी हैं ।
       आज के युग में हम, लोगों को अनेक धर्मों एवं सम्प्रदायों में विभक्त देखते हैं । कुछ ऐसे महामानव भी हुये जिन्होंने कहा कि सबका मालिक (भगवान् ) एक ही हैंब। फिर भी धर्म, संस्थाएं बनी हुई चल रही हैं । शिव इतने उदारवादी विश्व देव होने के बाद भी लोगों ने इनके नाम पर भी धर्म , संप्रदाय बना दिया । पुरातन काल से शिव की स्थिति एवं स्वीकृति पायी जाती है । एक ईश्वर मात्र शिव हैं जिनकी यह सृष्टि एवं इस सृष्टि के अच्छे बुरे सभी हैं, इसलिए वे सबसे बड़े साम्यवादी और समाजवादी हैं ।
        आस

Friday, October 30, 2015

आदि देव


 " आदि देव " 
आदि का अर्थ है - सर्वप्रथम | मनुष्य के विकास के अनेकों वैज्ञानिक विश्लेषण हैं | विद्वानों ने बताया की बंदरों के क्रमिक विकास से मानव बना | इतिहास बताता है कि मनुष्य प्रारंभ में जंगली जीवों के तरह रहता था ,आगे चलकर आवश्यकताओं के अनुरूप उसमें ज्ञान की उत्पत्ति हुई | और उसके रहन सहन में क्रमिक विकास होता गया | इतिहासकारों ने पाषाण , मध्यपाषाण एवं नवपाषाण कालों में मानव इतिहास का प्रारंभ कर ,कबीला ,कृषक ,व्यापारी आदि तक का विकास बतलाया | इस क्रम में आगे चलते हुए आज का मानव और उसकी सभ्यता है और ये आगे भी विकसित होती जायेगी | भविष्य मालूम नहीं बल्कि इसी मनुष्यों की जीवनियाँ इतिहास बनती जा रही है | 
मनुष्य के विकास का सच जो भी हो ,हम उसमें जाना नहीं चाहते ,लेकिन एक तथ्य तो हम निर्विवाद रूप से स्वीकार कर सकते हैं की मनुष्य की प्रारंभिक अवस्था में ही उसे आदि मानव की संज्ञा दी है | इन मानवों का अपना जीवन रहा होगा और इनके जीवन में सुख दुःख आते होंगे | सुख दुःख की झंझावातों में उन्हें किसी दृश्य या अदृश्य शक्तियों पर सोचने पर मजबूर किया होगा | सूर्य ,पृथ्वी ,आकाश,जल ,हवा, जानवर ,आदि उनके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया, जिसपर उनका कोई नियंत्रण नहीं था |इसलिए उन्हें ,उनलोगों ने सहायक शक्तियां माना | अपनी सुविधा एवं सुरक्षा के कारण ये सभी समूह में रहना प्रारंभ किये |कंद ,गुफाएं इनके आवास थे| समूहों में रहने के कारण एक शक्तिशाली सदस्य को उनलोगों ने अपना नेता ,मार्गदर्शक या रक्षक माना होगा | उनके जीवन में इन शक्तियों का महत्व हुआ होगा ,जिसको वे सम्मान देते होंगे | आगे चलकर सभी समूहों का एकीकरण हुआ होगा ,जिसको वे सम्मान देते होंगे ,जिनपर सभी सदस्यों को भरोसा रहा होगा | एस एक को एवं इसके समूह के सभी सदस्यों को आदि मानव कहा जा सकता है | 
इतिहास में इसपर बड़े बड़े शोध किये परन्तु सभी शोध तभी प्रमाणिक हुए ,जब उत्खनन कर सभ्यता के इतिहास की क्रमबधता तैयार की जाने लगी अर्थात पुरातत्व का प्रवेश हुआ | पुरातात्विक अवशेषों से ही काल्पनिक अथवा वैज्ञानिक मानवप्रणाली की पुष्टि की गयी और आजतक हम उसी क्रम में चल रहे हैं | इस शृंखला से मानव इतिहास का उद्गम सिन्धु घाटी ,हड़प्पा , मोहनजोदड़ो ,मिस्त्र ,मेसोपोटामिया की सभ्यता का इतिहास उल्लेखित हुआ ,जिसमें देखा गया की मानवके पाषाण युग से लेकर ग्रामीण एवं शहरी जीवन का भी विकास क्रम से हुआ | इससे पूर्व किसी दुसरे सभ्यता का पता पुरातात्विक साक्ष्यों से नहीं किया | इससे मानव के क्रमिक विकास की परिकल्पना को सहारा मिला | 
इन प्राचीन सभ्यताओं में यह साक्ष्य मिला है की वे आदि मानवों ने ईश्वर जैसी कल्पना भी की थी और उनको रूपहीन जानकर मिट्टी की एक खास बनावट (शिवलिंग ) तैयार कर उनकी पूजा करते थे। अर्थात् जल , थल , वायु, सूर्य, चन्द्र, के ऊपर भी एक अदृश्य शक्ति को स्वीकार किये थे, जिन्हें सुख-दुःख का कारक मानते हुए कल्पना को मूर्त रूप देने का प्रयास किये जिसका परिणाम है उत्खनन में प्राप्त शिवलिंग। आगे चलकर उनके मस्तिष्क ने उसका मानवीकरण भी करने की में स कोशिश की जिसका परिणाम हुआ पशुपति के रूप में आज के वे शिव। इस पशुपति स्वरुप के साक्ष्य प्राचीन सभ्यताओं में मिले हैं।आज के मंदिरों मे स्थित शिवलिंग उसी की नक़ल है।
इस प्रकार सभ्यता के प्रथम देव आदि देव थे।उस समय न तो जाति थी न धर्म था न क्षेत्र वाद था। जाति, धर्म, स्थान,सम्प्रदाय तो वाद के दिनों की उपज है। आज जिस शिव की पूजा की जाती है वे ही आदि देव थे और उन्हें ही आदि देव माना जाता है। भले ही मध्य से आधुनिक युगों तक सभ्यता के विकास और उसके विस्तार ने मानवों को क्षेत्र, धर्म,सम्प्रदाय आदि में विभक्त कर दिया हो और इसके अनेकों पंथ हो गए हों परन्तु इसमें विवाद का कोई आधार नहीं उपलव्ध है , जिससे यह मानने में अबरोध हो की शिव ही आदि देव थे और आज भी आदि के रूप में स्थापित हैं । किसी ऋषि मुनियों ने, ग्रन्थों ने आदि देव का अर्थ शिव के सिवा किसी दूसरी शक्ति को नहीं माना है।
मानवों की उत्पत्ति के तर्कों में एक तर्क यह भी आता है की स्त्री एवं पुरुष के मेल से मनुष्य ( नर-नारी ) का उद्भव होता है, परन्तु स्त्री एवं पुरूष को उत्पन्न करने वाले कौन थे तो पुनः उत्तर होगा एक स्त्री एवं एक पुरुष । इस शृंखला को जितना पीछे ले जा सकते हैं उतना पीछे ले जाया जाय तो एक स्थिति ठहराव की आती है की होगी कोई सत्ता जिस एक से स्त्री एवं पुरुष का उद्वभव हुआ। अर्थात् एक सत्ता तो होना ही होगा और उस एक सत्ता में स्त्री एवं पुरूष का समन्वित रूप रहा होगा जिसका परिणाम स्त्री, पुरुष एवं आगे आज तक की जनसंख्या । इस से स्पष्ट है कि वह जो सत्ता थी , वह मात्र एक थी जिसके सन्तान पूरी सृष्टि के लोग हैं । इस स्थिति में उस सत्ता को आदि पुरुष, आदि शक्ति कहा ही जायेगा । चूँकि उस सत्ता में विना स्त्री पुरुष के ही सृष्टि उत्पन्न करने की शक्ति थी और मानव वर्ग का वह ही एक ( माता - पिता ) पूर्वज था इसलिए भी उस आदि पुरुष को आदि देव कहा गया जो नाम सिर्फ शिव को प्राप्त है और इसी विज्ञान को प्रदर्शित करता हुआ उनका अर्द्ध नारीश्वर स्वरूप प्रचलित है ।
आदि का अर्थ होता है प्रारम्भिक । जैसे आदि काल, आदि पुरुष, आदि देव, आदि नाम, आदि भौतिक, आदि मूल, आदि। सबों का अर्थ प्रथम या प्रारम्भिक के रूप में लिया जाता है।इस दृष्टिकोण से भी शिव को आदि देव या आदिनाथ कहा गया । बाद के हिन्दू ग्रन्थों। में बहुत से उदाहरण कथाओं के माध्यम से दिए गए हैं, जिससे स्पष्ट होता है कि सभी देवों के प्रथम देव शिव ही थे और उन्हीं को आदि देव कहा गया । तीन देवो "व्रह्मा","विष्णु" और "महेश" की परिकल्पना में "महेश" शिव को कहा गया और उन्हें संहारक शक्ति का मालिक बताया गया। ।उत्पत्ति के मालिक व्रह्मा, स्थिति के विष्णु और पुरे प्रणाली को नष्ट करने के प्रभारी शिव को माना गया। गहराई से चिन्तन करने से यह ज्ञात होगा कि संहार या नष्ट करने की शक्ति उसी को होती है जिसे उत्पन्न और पालन करने की शक्ति होगी । वस्तुतः शिव ही सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति एवं लय के कारक हैं।उत्पत्ति,स्थिति और लय तीनों क्रियाएँ शिव ही संचालित करते हैं। इनके तीनों स्वरूपों के मानवीकरण में उत्पत्ति की शक्ति को ब्रह्मा, स्थिति की शक्ति विष्णु एवं संहार करने की शक्ति शिव को देते हुए तीन नाम क्रमशः व्रह्मा,विष्णु और महेश नाम रखे गए लेकिन रहस्य के तौर पर ये तीनों शक्तियों के धारक मात्र शिव हैं।
संहार का अर्थ होता है सब कुछ नष्ट हो जाना यानि शून्य से कुछ सृष्ट होना और फिर संहार की प्रक्रिया से पुनः शुन्य की स्थिति हो जाना। शून्य से सृजन,सृजित का अस्तित्व में रहना और फिर उसका नष्ट हो जाना। इन तीनों प्रक्रियाओं को करने वाली सत्ता स्वयं अक्षुण रही यानि जिसने कुछ सृष्ट किया, रक्खा और समाप्त कर दिया वह अंत में स्वयं तो वच ही गया । पुनः जब उसकी ई च्छा हुई सृजन हुआ उसकी स्थिति रही और फिर वह नष्ट हुआ। इस क्रम के कारक शक्ति शिव को मूल रूप से मन गया। इस चिंतन के आधार पर भी शिव् को आदि देव कहने में कहीं आशंका नहीं रह जाती। महाशून्य इ से प्रथम बार जगत् उत्पन्न हुआ और चल रहा है। समय याज भी आ सकता है जब यह जगत्( सृष्टि ) पूर्णरूपेण संहारित(समाप्त) हो जाय। इसके बाद पुनः महाशून्य की स्थिति हो जायेगी परन्तु वह शक्ति रहेगी। वो शक्ति फिर जब इच्छा करेगी तो जगत् सृष्ट होगा, उसकी इच्छानुसार उनकी ईच्छा तक कायम रहेगा।यद्यपि सृष्टि के प्रथम बार सृष्ट होने के पश्चात् आवश्यकता के अनुसार कई छोटे बड़े सृजन, स्थिति एवं लय की घटना होती रहती है। मनुष्य या पदार्थ जन्म लेता, रह्ता है और फिर नष्ट हो जाता है । चीजें बनती है , रहती है फिर नष्ट हो जाती है, अर्थात् सृष्टि के सृष्ट हो जाने के बाद इस सृष्टि के अन्तर्गत विभिन्न प्रकार की उत्पत्ति,स्थिति अवं लय का क्रम पल-प्रतिपल चलता रहता है और इन सबों के पीछे उसी सृष्टि कर्ता, पालनकर्ता एवं संहारकर्ता शक्ति के धारक आदि देव शिव की इच्छा ही रहती है । इसप्रकार महाशून्य से सृष्टि का प्रथम बार सृष्ट होना उसका चलना और पूर्ण रुपेण उसका विलय हो जाना एक मूल क्रिया है । परन्तु दैनिक जीवन में सृष्टि के विभिन्न आयामों को उत्पन्न होना , रहना और नष्ट होना लघु और लगातार चलने वाली क्रिया है, जो चल रही है । मनुष्य भी अपनी ईच्छा से बहुत सी चीजों को उत्पन्न किया अर्थात् बनाया । उसने जलयान ,वायुयान से लेकर बड़े- बड़े अस्त्र-शस्त्र और आयुध बनाये ,यन्त्र बनाये; उसको चलाते हैं और उसको नष्ट भी करते हैं। यह भी एक प्रकार का वैसा ही कार्य है । परन्तु यह सृष्ट सृष्टि के अन्तर्गत मानव जनित है । आदि देव "शिव" की बात जब होती है तो जगत् के अवतरण से अर्थ लिया जाता है ।
।।।।।इस आलेख के बाद अगले आलेख का इन्तजार कीजिये और अपनी भावना से अबगत कराइये ।।।।।
                                                                                                                                  हेमचन्द्र प्रसाद
                                                                                                                                  शिव-शिष्य

सर्वोच्य देव


सर्वोच्य देव 

इतिहास को जानने के मुख्य दो आधार हैं । एक पुरातात्विक अवशेष एवं दूसरा साहित्यिक साक्ष्य । पुरातत्व के आधार पर हमने देखा है कि शिव आदि देव के रूप में प्रारम्भिक सभ्यता में भी अवस्थित थे । बाद में साहित्यिक साक्ष्यों में प्रथमतः वेद आया । वेदकाल का अध्ययन भी दो अध्यायों में किया जाता है - एक ऋग्वेदिक काल और दूसरा उत्तरवैदिक काल । वेदों की रचना की गहराई में हम नही जाना चाहते, परन्तु इतना स्पस्ट है कि इसके रचयिता विद्वान् थे और भाषा ( संस्कृत) समृद्ध हो चुकी थी । ऋग्वेद प्रारंभिक (आदि ) ग्रन्थ है जिसमे शिव को रूद्र की संज्ञा देते हुये उन्हें उच्च स्थान नही दिया गया । बताया गया कि वे आदिवासियों के देवता हैं और दूसरे को रुलाने वाला हैं । रुलाने वाला कहने का अर्थ है कि ऋग्वेद लिखने वाली सभ्यता पर रूद्र का एवं उनकी शक्तियों का वर्चस्व था अर्थात् वे इतने शक्तिशाली थे जिनसे सभी बाहरी या उन्नत सभ्यता के लोग डरते थे । हमें इस विषय पर विचार नही करना है कि पूर्व में यानि ऋग्वेदिक काल में शिव किस सभ्यता के देवता थे और कौन सी सभ्यता उनसे डरती थी, चूँकि विषय यह नही वल्कि यह है कि शिव शक्तिशाली देवता थे , जो प्रमाणित हो रहा है ।
उत्तरवैदिक कल में शिव को कल्याणकारी देव के रूप में मान्यता दी गयी और उनको सम्मान देने एवं उनकी पूजा करने की बात स्वीकार की गयी । शिव की शक्तियाँ जैसी भी रही हो लेकिन उत्तर वैदिक काल ने पूर्व से ( ऋग्वेद ) स्थापित देवताओं (अनेकों ) में श्रेष्ठ स्थान दिया और उन्हें सभी मान्यता प्राप्त देवताओं स्थान दिया । इस प्रारम्भिक शास्त्र ने भी उन्हें सर्वोच्य देव का स्थान दिया ।
आगे चलकर इनकी सर्वोच्चता लगातार बनी रही । इसके ऐतिहासिक पहलुओं का अध्ययन हमारा विषय नही है , लेकिन जो मान्य धारणाएं एवं तथ्य लोगों के वीच चली आ रही है उनमे से आसान एवं सर्वसुलभ सन्दर्भ को तो देखना ही होगा । सर्वप्रथम हम रामायण को लेते हैं । रामायण में राजा रामचन्द्र को भगवान के रूप में स्थापित किया गया है । भगवान राम को एक मात्र शक्तिशाली सत्ता माना गया है जिन्होंने सामाजिक प्रणाली एवं मर्यादा को निभाते हुये जीवों को मोक्ष देने का कार्य किया । पूरे रामायण में श्री राम को सर्वशक्तिशाली भगवान मां गया है । इसके रचयिता श्री तुलसी दास जी बहुत ही विद्वान् और ईमानदार भक्त थे । उन्होंने श्री राम की सविस्तार व्याख्या करते हुये भी वीच-वीच में उन्होंने भगवान शिव को हमेशा सर्वोच्य बनाये रखा । उन्होंने बुद्धि से शिव को ही सर्वोच्य देव बताया । उन्हें भावी को मिटाने वाला कहा गया । शिव- विवाह प्रकरण में श्री तुलसी जी ने शिव को श्रेष्ठ बनाने की एक घटना का समावेश किया । जब विवाह के समय पुरोहित द्वारा शिव से पिता का नाम पूछा गया तो ब्रह्मा ने अपने को शिव का पिता कहा । जब पितामह का नाम पूछा गया तो वहां स्थित विष्णु से पितामह कहबाया गया परन्तु जब शिव से उनके परपितामह का नाम पूछा गया तो कोई सामने नही आये,चूँकि उस समय तो और इनसे वरीयतम कौन होते जो परपितामह बनते । चुप्पी देखते हुए स्वयं शिव से ही श्री तुलसी जी ने कहबाया की सबके पितामह तो मैं खुद ही हूँ ।
जब लंका की चढ़ाई होती है तो बताया कि बिना शिव की पूजा किये श्री राम लंका पर विजय
प्राप्त नही कर सकते । उसी समय समुद्र के किनारे श्री राम से शिव की पूजा करबायी गयी जिसे आज रामेश्वरम ज्योतिलिंग के रूप में मन और जाना जाता है । श्री राम को भगवान और सर्वसमर्थवान बताने के साथ ही शिव को ही सबसे उच्च स्थान दिया गया । दूसरे शब्दों में कहा जाय कि पूर्व से सर्वोच्य रहे शिव की सर्वोच्चता को रामायण में बरक़रार रखा गया ।रामायण एवं विनय पत्रिका में ऐसे कई सन्दर्भ हैं , जिनके अवलोकन से शिव की सर्वोच्चता स्पस्ट होती है । इसके विस्तार में जाने से लेख लंबा हो जाएगा ।
महाभारत की कथा सभी जानते हैं । इस कथा में श्रीकृष्ण को ईश्वर का अवतार और सर्वशक्तिशाली माना गया । उन्हें सर्वोच्य भगवान के रूप में रखा गया । गीता में सभी योगों का वर्णन किया गया और श्री कृष्ण को योगिराज तक की संज्ञा दी गयी । वताया गया कि श्रीकृष्ण की भक्ति के बिना जीव की मुक्ति , जीवन-मरण से नहीं हो सकती । महाभारत और गीता लिखने वाले भी बहुत विद्वान् और आध्यात्मिक थे । उन्हें भी पता था कि शिव ही आज भी सर्वोच्य देव हैं । श्री कृष्ण सृष्टि कर्ता,पालन कर्ता, साधुओं के रक्षक और असाधुओं के संहारक माने गए । उन्हें पूरी सृष्टि की नियामक सत्ता बताया गया अर्थात् उत्पत्ति , स्थिति एवं लय के जनक माना गया , परन्तु युद्ध की पूरी तैयारी हो जाने के वाद श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा की व्रह्माण्ड की पूरी शक्तियाँ तुम्हारे साथ है , मैं व्रह्म भी तुम्हारे साथ हूँ । मैं जो चाहूँगा वही होगा , तुम एक निमित्त मात्र हो फिर भी जव तक शिव को प्रशन्न कर उनसे पाशुपतास्त्र हासिल नही करोगे तबतक महाभारत का युद्ध तुम नहीं जीत सकते । श्री कृष्ण ने इस हेतु श्री अर्जुन को शिव के पास भेजा । तात्पर्य यह है कि यहाँ भी शिव की सर्वोच्चता को अप्रत्यक्ष रूप में ही सही बरक़रार रखी गयी ।
समुद्र मन्थन की कथा सवको मालूम है । समुद्र मन्थन में अनेकों अमूल्य वस्तुओं के साथ साथ विष भी निकला था । इस विष को धारण करने वाले कोई भी देवता सक्षम नही हुए और इस विष के प्रभाव से सभी प्रभावित होने लगे थे । अंत में मात्र शिव ने उस गरल को अपने कंठ में धारण कर सबों की रक्षा करते हुये अपनी सर्वोच्चता प्रमाणित की । मुरकुण्ड ऋषि को कोई पुत्र नही था । व्रह्मा , विष्णु सभी को प्रशन्न किया ऋषि ने लेकिन सभी देबताओं ने पुत्र देने का वरदान देने में अपने को सक्षम नही बताया वरन् इतना बतला दिया कि जब भाग्य में लिखा न हो और उसे पाना हो तो शिव ही एक मात्र सक्षम सत्ता हैं । मुरकुण्ड ऋषि ने कठिन तप कर शिव को प्रशन्न किया और पुत्र प्राप्ति की । प्रारम्भ में अल्पायु होने का वर था वाद में ऋषियों के आशिष से शिव ने उन्हें अधिक उम्र का भी बरदान दिया । कथा है कि जब यमराज वालक मार्कण्डेय को लेने आया था उस समय मार्कण्डेय शिव पूजा में थे पिता के आदेश से । यमराज ने जवर्दस्ती की तो शिव ने यमराज को ही नष्ट करने की कोशिश की ।
ऐसे बहुत से उल्लेख आये हैं जहाँ शिव को ही सर्वशक्तिशाली और सर्वोच्य देव माना गया । इन सभी उल्लेखों के जिक्र से पाठक अवगत हैं । सबों की विस्तृत विवेचना से मूल विषय से सामान्य पाठक अलग हो सकते हैं और मूल विषय प्रासंगिक नही रह पायेगा । दी गयी हल्की और मुख्य विवेचना से ही स्पष्ट हो जाता है कि महाभारत (गीता) में भी श्री कृष्ण की उच्चता में शिव की सर्वोच्यता अक्षुण्ण रही ।
फिर प्राणियों के प्राणों की रक्षा करने, जानलेवा शारीरिक कष्टों को दूर करने , कर्मफल को नष्ट करने और मृत्यु को टालने की शक्ति भी शिव में ही निहित मानी गयी है । जव जीवन रक्षा के सभी उपाय व्यर्थ 1चले जाते हैं तव जीवन के लिए महामृत्युंजय पूजा का विधान पुरातन काल से मान्य होता चला आ रहा है ।अर्थात् सृष्टि को अंत होने से रोकने का प्रभावशाली शक्ति शिव के पास ही है ।आज भी यह मान्यता सर्वमान्य रूप से स्थापित ही है ।
मुख्य रूप से स्थापित त्रिदेवों में सर्वोच्य स्थान शिव को ही देने का विज्ञान भी इसी तथ्य से स्पष्ट है कि यदि व्रह्मा सृष्टि के जनक हैं , विष्णु स्थिति (पालन) के देवता हैं ,परन्तु शिव संहार (लय) के देवता हैं ।जिन्हें लय(मिटाने) की शक्ति होती है उन्हें ही सृजन की शक्ति भी अकाट्य रूप से होगी ही होगी । लय के वाद जो सत्ता रहेगी वही फिर से सृजन, स्थिति एवं लय की प्रक्रिया प्रारम्भ करेगा । इसी सन्दर्भ में शिव को महाकाल भी कहा गया है ।
जव कोइ सत्ता सृष्टि उत्पन्न करेगी, चलायेगी और जब ईच्छा हो समाप्त करेगी तो यह कहना न होगा कि सृष्टि के साथ प्यार भी उसी सत्ता को होगी, अर्थात् सृष्टि का कण कण ,काल का पल-पल उसकी की दया से परिपूर्ण होगी । जो जिस चीज का निर्माता होगा उससे सर्वाधिक प्यार तो उसी सत्ता को होगा , यह प्रकृति का सिद्धान्त है और स्वाभाविक है । इसी का परिणाम है कि इस कायनात के जितने भी जीव हैं चाहे देवता हों,चाहे असुर हों,चाहे साधू हों या असाधु हों, सभी तो उसी के द्वारा उत्पन्न हैं, इन सबों से प्यार तो शिव को ही होगा । अनेकों उदहारण ऋषियों ने रखें हैं । मात्र शिव ही ऐसे मान्य देवता हैं जिनकी वन्दना देवता भी करते हैं और दानव भी । शिव की नजर में साधू एवं असाधु सभी सामान एवं प्रिय हैं । 
देवताओं की परिकल्पनाओं में बताया गया है कि देवता किसी खाश कार्य के निष्पादन के लिए आते हैं । राम एवं कृष्ण के बारे में कहा गया है कि वे साधुओं के रक्षक हैं और असाधुओं के संहारक । श्री राम एवं श्री कृष्ण ने अपना सिद्धान्त दिया की जब-जब सृष्टि में असाधुता बढ़ेगी यानि दानवी प्रवृति पैदा होगी तब-तब मनुष्यों ,साधुओं की रक्षा के लिए दानवों का संहार करेंगे । बताया गया की निर्मल मन वाला, पवित्र ह्रदय वाला ही उनकी कृपा प्राप्त कर पाएगा । लेकिन शिव का कोइ शर्त नहीँ था । उन्होंने कभी नहीँ कहा कि साधुओं की रक्षा करेंगे और असाधुओं का नाश । कहते भी कैसे सभी ( साधू -असाधू ) तो उन्हीं के आदमी हैं और प्यार उनको सबों से है । इस सिद्धान्त के कारण शिव, सुरासुर पूजित हुये अर्थात् देवताओं में साथ-साथ असुरों ने भी उनकी वन्दना की । उन्होंने सबों को समान रूप से अपनी दया से अविभूत किया,सबों को वर दिया । अपने चाहने वालों के लिए कोइ पात्रता या शर्तें नहीँ राखी । कहा तो यह गया कि शिव सर्वप्रथम उपेक्षितों, निराश्रितों को प्राथमिकता देते हैं ।उनके गणों में देवता के साथ-साथ दानव भी हैं । उसी कारणों से ऋषियों ने,देवताओं ने , सबों ने उन्हें देवो के देव अर्थात् देवाधिदेव शिव कहा । पुण्यात्मा एवं परमात्मा सभी के लिए वे सुलभ बने । उनकी पूजा के लिए किसी माध्यमों ,वस्तुओं या प्रक्रियाओं की जरुरत नही है । वेलपत्र,भांग,धतूरा आदि किसी उपेक्षित वस्तुएं शिव पर चढ़ायी जाती है जो एक साधारण से साधारण व्यक्ति भी आसानी से कर सकता है । 
आज के कालखण्ड में शिव की बात होती है तो लोग इसे भारत देश से संबंधित देवता मानते हैं । पूरा व्रह्माण्ड आज क्षेत्र,स्थान आदि के कारण अलग-अलग रहन-सहन , जलवायु,सभ्यता,संस्कृति धारित करते हुये अनेक छोटे-बड़े देशों में विभक्त दीखता है । जब भी अध्यात्म में सृष्टि,चराचर ,कायनात आदि शव्द पृथ्वी के लिए प्रयोग किये जाते हैं तो उसका अर्थ पूरी सृष्टि से ली जाती है । जब सृष्टि शव्द आएगा तो उसमेँ पूरी पृथ्वी आएगी चाहे वो जहाँ तक फैली है । सृष्टि का अर्थ सिर्फ मानवी सभ्यता से नही ली जा सकती । सृष्टि में पांचों तत्वों की उपस्थिति जहाँ तक है वहां तक की समझ लानी पड़ेगी । पांचों तत्व से अर्थ है -अग्नि,पृथ्वी,हवा,आकाश,जल एवं अग्नि । ये तत्व किसी खास क्षेत्र या सभ्यता की बात नहीँ कहेंगे ।
जब सृष्टि का उदगम् हुआ उस समय ये विशुद्ध 5 तत्वों के साथ मनुष्य एवं अनेकों जीव थे । उस समय न जाति थी,न धर्म-सम्प्रदाय था,न नश्ल थी और न ही क्षेत्रवाद और जातिवाद ही था । यह उत्पत्ति मात्र शिव की ईच्छा थी । यह शिव वह एक शक्ति थी जो सृष्टि के पूर्व महाशून्य में भी थी और अपनी मौज से स्वयंभू (शम्भू) हुये । उनकी मौज (ईच्छा) से सृष्टि सृष्ट हुई । जानकारों ने शिव के उस स्वरुप का मानवीकरण किया तो अर्धनारीश्वर का रूप दिया जिसमे स्त्री एवं पुरुष की सम्मिलित शक्ति दिखायी गयी ताकि सर्वसाधारण को यह समझ में आए कि शिव ही वह शक्तिशाली परम शुक्ष्म ऊर्जा थे और सृष्टि की रचना में उनको किसी प्रक्रिया की आवश्यकता नही थी, उन्होंने चाहना की और सृष्टी ,सृष्ट हो गयी ।यह समस्या नहीं छोड़ी गयी की पहले मुर्गी 'या' पहले अंडा ? सृष्टि प्रारम्भ हुई तो समय ( काल ) भी नहीं था परन्तु शिव थे इसलिए उन्हें महाकाल भी कहा गया ।
इसप्रकार पुरे चराचर के स्वामी शिव थे । आज की तिथि में मानव सभ्यता के विकास के साथ-साथ क्षेत्रवाद ,जातिवाद ,नश्ल वाद ,जातिवाद, आदि की उत्पत्ति हुई और मनुष्यों ने अपनी संस्कृति एवं क्षेत्रीय स्थिति के अनुसार अपने-अपने देवि -देवताओं की परिकल्पना की । आज हर देश चाहे वो छोटा हो या बड़ा, अपना ईश्वर बना लिया, अपनी पूजा पद्धत्तियाँ बना ली । आज के परिवेश में मूल ईश्वर के विषय में सर्व सामान्य को सोचने की परिस्थिति ही नही है । आज की पीढ़ी वर्तमान परिस्थितियों (आध्यात्मिक रूप से ) की दास हो गयी ।
आज बस इतना ही ।